अहमदाबाद के सवा सौ साल पुराने एलिस ब्रिज के पास एक 83 साल का बूढ़ा बाजरा बेचता है। करीब 60 साल से यहीं गुज़र बसर कर रहा ये आदमी देखने में बिलकुल आम है लेकिन काम इसके खास हैं। लोकल मीडिया के माध्यम से पूरा अहमदाबाद अब इसे जानता है। मुझे लगा हमारे दोस्तों को भी जानना चाहिए।

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मीठालाल सिंधी नाम के इस बुजुर्ग ने पिछले 57 सालों में 550 से ज्यादा लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार अपनी जमा पूंजी लगाकर किया है। विभाजन के वक्त पाकिस्तान से भारत आए मीठालाल का शुरुआती ठिकाना मुंबई था लेकिन 1957 में उन्होंने अपने एक दोस्त न्यालदास सिंधी के साथ अहमदाबाद के मणिनगर में फल बेचने की रेहडी लगाई। दोनों दोस्त साथ ही रहते-खाते थे। दो साल बाद एक सुबह मीठालाल ने अपने दोस्त को जगाने की कोशिश की तो पाया कि रात में ही उसकी मौत हो चुकी है। पैसों की कमी से जूझ रहे मीठालाल ने दोस्त के क्रियाकर्म के लिए सबसे मदद की गुहार लगाई मगर किसी ने उन्हें पैसे नहीं दिए। तब मीठालाल ने ही किसी तरह दोस्त का अंतिम संस्कार किया, लेकिन इसके बाद मीठालाल को ये सवाल बेचैन करने लगा कि जिनका कोई नहीं होता उनकी लाश का क्या होता है। उस दिन के बाद मीठालाल ने फल बेचना छोड़ दिया और ठान लिया कि लावारिस लाशों की सम्मान के साथ अंतिम क्रिया करना ही उनकी बची हुई ज़िंदगी का मिशन होगा।

आज 57 साल हो चुके हैं। खुद कोई धर्म ना माननेवाले मीठालाल लाश पर धार्मिक निशान ढूंढ़ते हैं और उसी हिसाब से अंतिम क्रिया करते हैं। अक्सर वो मरनेवाले के परिजनों की तलाश भी करते हैं मगर अधिकतर मामलों में परिजन मुकर जाते हैं। मीठालाल के एक बेटा और तीन बेटियां हैं। सड़क किनारे एक फास्ट फूड का ठेला लगाते हैं। घर भी है मगर मीठालाल अकेले ही फुटपाथ पर रहते हैं। पूछने पर कहते हैं कि ये ही अकेली जगह है जहां लोग ज़रूरत पड़ने पर मुझे आसानी से ढूंढ सकते हैं। अपनी छोटी सी पैतृक संपत्ति में भी उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं, वो तो बस उस रिक्शा को अपने साथ रखते हैं जिस पर लाश को ढोकर श्मशानघाट या कब्रिस्तान तक पहुंचाते हैं।

मीठालाल बताते हैं कि एक लाश के क्रियाकर्म में करीब डेढ़ हजार रुपये लगते हैं और इसी खर्चे को उठाने के लिए वो फुटपाथ पर बाजरा बेचते हैं। वो ऊपरवाले का शुक्रिया अदा करते हैं कि उसने उन्हें इस काम के लिए चुना। मीठालाल जैसे बुजुर्गों ने ज़िंदगी में कुछ मिठास बचा रखी है।हम उनका शुक्रिया करते हैं।