एक समय की बात है ,,,एक शहर मे बहुत बड़ा राजा रहता था,,,,राजा के पास दास दासियां कीमती माल खजाने,,सैनिक, हाथी घोड़े हथियार इन सब की कोई कमी ही नही थी,,,राजा ने अपने महल की छत पर एक ऐशगाह बनवाई हुई थी,,,जिसमे शराब,,शबाब और कबाब का सब इंतजाम था,,,,राजा अय्याशी के लिए रोज अपनी ऐशगाह मे आया करता था,,,,सर्दियों के दिन थे,,,हर रात की तरह राजा अपनी ऐशगाह मे आया राजा के ऐशगाह मे आते ही सब दासियां शराब और कबाब लेकर राजा के आगे पीछे घुमने लगी,,,राजा अपने मन मे सोचने लगा ,,,वाह क्या किस्मत है मेरी लगता पुरे संसार मे मै सबसे सुखी और खुश किस्मत इन्सान मै ही हुँ,,,सुख का अहसास और खुशी का भाव लिए राजा महल की छत पर कभी इधर कभी उधर टहल रहा था,,,तभी राजा की नजर दुर किसी भट्ठी पर गइ,,,राजा ने देखा के इतनी ठण्ड मे एक फकीर लंबे कुर्ते और साफे मे घूम रहा है ,,,,,राजा ने देखा की उस फकीर ने भट्ठी मे थोड़े दाने पकाकर खाऐ और पानी पीकर सो गया ,,,थोड़ी देर बाद राजा ने देखा कि वो फकीर भट्ठी से बाहर आकर समाधी लगाकर बैठ गया,,,,फिर थोड़ी देर बाद जब उस फकीर को ठण्ड लगी तो वो अन्दर भट्ठी के पास जाकर अपना साफा लेकर सो गया,,थोड़ी देर बीत जाने के बाद वह फकीर फिर भट्ठी से बाहर आया और समाधी लगाकर बैठ गया,,,,,पौं फटने तक राजा यह सब देखता रहा,,,और राजा सोचने लगा के कितना दुःखी इन्सान है ,,,,खाने के लिए रोटी की जगह दाने है और इतनी ठण्ड मे पहनने के लिए एक जोड़ी कपड़ा,,,अगर दुनिया का सबसे सुखी इन्सान मै हुँ तो यकीनन यह दुनिया का सबसे दुःखी इन्सान है ,,,,अगले दिन सुबह राजा ने अपने मंन्त्री से कहा की जाओ उस भटठी मे रहने वाले फकीर को लेकर आओ,,,,,थोड़ी देर बाद उस फकीर को राजा के सामने पेश कर दिया गया,,,,,,राजा ने उस फकीर से कहां कि बताओ कल रात तुम्हारी कैसी गुजरी,,,,,, फकीर ने बड़े सुकून से जवाब दिया के कुछ आप जैसी और कुछ आपसे भी अच्छी,,,,,,,,,,
राजा ने जब फकीर का यह जवाब सुना तो राजा हैरान हो गया,,,,,राजा ने फकीर से कहा की बताओ मेरे जैसी कैसे और मेरे से अच्छी कैसे तो फकीर ने कहां की जैसे 2घड़ी आपने सोया वैसे ही 2 घड़ी मैने सो लिया,,,यह हो गई आप जैसी,,,आपने बाकि का समय शराब, शबाब और कबाब मे गुजार दिया,,,जिससे आपने दुनिया के जेलखाने के बंधन को और मजबूत कर लिया,,,जिससे आपको धर्मराज को पुरा हिसाब देना पड़ेगा, वो तुमसे पुछेगा शराब से तुमने इस नर नरायणी देह को गंदा क्युँ किया,,,तुमने अपनी श्वासो की पुंजी शबाब और भोग विलास मे क्युँ लगाई,,,और जिस कबाब को आज तक तेरे लिए काटा गया पकाया गया फिर तेरी थाली मे परोसा गया,,,उसके माँस के एक एक टुकडे का हिसाब देना पड़ेगा,,,और मैने बाकि का समय सत्तपुरूष की भक्ति मे लगाया, जिससे मेरे 84 के आवागमण के चक्कर कट जाऐंगे ,मैने रात की कीमत वसूल की है मैने श्वासो की कीमत वसूल की है,,,,,,,,इसलिए मैने कुछ रात आपसे अच्छी गुजारी है,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
राजा और फकीर के जीवन जीने के ढंग से पता चलता है के राजा जो बहुत अमीर है जिसके पास ऐशो आराम के सारे साधन है उसका इश्वर की राह मे सोचना,,,मुक्ति की राह मे सोचना फकीर के मुकाबले कठिन है क्युँकि राजा सुख सुविधाओ और दुनियादारी से भरा पड़ा है,और राजा जिस सुख को सुख समझता है ,,वह कर्मो का भोज है,,और दुसरी और फकीर ने अपना खाना पहनना रहना सहना बहुत कम रखा है जिससे उस फकीर को अपना ख्याल एकाग्रचित करने मे बड़ी मदद मिलती है,,,और उस फकीर ने अपनी सच्चखण्ड जाने की त्यारी बहुत सरल कर ली है,इस लिए शब्दो मे आता है***मन लागो मेरो यार फकीरी मे***लै लै फकीरा दी लोई वे सज्जना***इन सब शब्दो का एक ही अर्थ है फकीरों जैसा रहन सहन अपनाओ,,,कम खाना कम सोना रात को जागना,,,,,,,,,,,,,
सिमरन करो जी