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बौद्ध भिक्षु बनने की एक अनिवार्य शर्त यह थी कि व्यक्ति को अपना नाम बदलना पड़ता था और उसे एक नया नाम दिया जाता था। ऐसा करने के पीछे उद्देश्य यह था कि उसे अपने वर्ण, गोत्र, जाति इत्यादि का आभास न रहे और सब शिष्यगण अपने अहंकार को विस्मृत कर दें।

एक बार शिष्यों के बीच इसी नियम को लेकर चर्चा चल पड़ी। कुछ शिष्य कहने लगे कि दीक्षित होने के बाद भी शरीर छूट तो नहीं जाते, ऐसे में व्यक्ति का गोत्र, जाति, वर्ण आदि कैसे छूट सकता है? उनके बीच काफी देर तक इसी पर विचार-मंथन चलता रहा, लेकिन वे किसी नतीजे तक नहीं पहुंच सके।

बात भगवान बुद्ध के कानों तक भी पहुंची। उन्होंने सभी शिष्यों को एक जगह एकत्र कर कहा – ‘आज तुम लोगों के बीच जिस विषय को लेकर मंथन चल रहा था, वह मुझे ज्ञात है।” तभी एक शिष्य बोला – ‘हां भगवन्, हम लोगों ने बहुत सोचा, लेकिन हम इस बात को नहीं समझ सके कि भिक्षु बनने के लिए नाम बदलने की अनिवार्य शर्त क्यों हैं? आखिर व्यक्ति का शरीर तो वही रहता है। फिर ऐसे में उसे गोत्र, जाति, वर्ण इत्यादि से किस प्रकार मुक्ति मिल सकती है?”

यह सुनकर भगवान बुद्ध मुस्कराए और बोले – ‘वत्स, क्या तुमने सांप को देखा है?” जवाब में शिष्य बोला – ‘हां, बिलकुल देखा है।” बुद्ध ने अगला प्रश्न किया – ‘तो तुमने सांप की केंचुली भी देखी होगी?” ‘हां भगवन्, देखी है।” – शिष्य ने पूर्ववत जवाब दिया। तब बुद्ध बोले – ‘कोई बताए कि जब केंचुली आती है तो क्या होता है?” एक शिष्य बोला – ‘भगवन्, केंचुली आने पर सांप अंधा हो जाता है।” इस पर भगवान बुद्ध ने अगला सवाल किया – ‘और जब केंचुली छूट जाए तब?” शिष्य का जवाब था – ‘तो सांप को पुन: दिखने लगता है।”

तब तथागत ने सभी शिष्यों को समझाते हुए कहा – ‘इसी तरह गोत्र, वर्ण, जातियां इत्यादि भी व्यक्ति के लिए केंचुली के समान ही हैं। जब तक इनका आवरण रहता है, तब तक मनुष्य इनके अहंकार में अंधा बना रहता है। परंतु जब ये केंचुलियां छूट जाती हैं, तो उसे सर्वव्यापी विराटसत्ता की अनुभूति होने लगती है। इसीलिए नाम, पद, यश, कुल और गोत्र की अहंता से विमुक्त होना आवश्यक है।” यह सुनकर शिष्यों की शंका का समाधान हो गया।

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