रत्नों का औषधि के रुप में उपयोग

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रत्नों तथा उपरत्नों के उपयोग के बारे में सभी जानते हैं. ज्योतिष तथा आयुर्वेद दोनों में ही प्रमुख नौ रत्नों के विषय में महत्वपूर्ण जानकारियाँ उपलब्ध हैं. आयुर्वेद में रत्नों का औषधि के रुप में भी   उपयोग किया जाता है. वैदिक ग्रंथों में रत्नों के औषधि के रुप में उपयोग की विधियाँ दी गई है. रत्नों का उपयोग भस्म के साथ-साथ उसकी पिष्टी(पीसकर) बनाकर भी किया जाता है. हर प्रकार के रोगों में इन रत्नों की भस्म का उपयोग बताया गया है. सामान्य तथा कठिन सभी रोगों का निवारण इन भस्मों द्वारा होता है.

प्राचीन समय से वैद्य तथा हकीम बहुमूल्य रत्नों की भस्म बनाते आ रहें हैं. सभी अच्छे रत्न इस भस्म को बनाने में उपयोग में लाए जाते हैं. इन भस्मों को बनाने के लिए कई जटिल प्रक्रियाओं से होकर गुजरना पड़ता है. सभी प्रमुख रत्नों की भस्म का उपयोग अलग-अलग है.

माणिक्य की भस्म | Ash of Ruby

इस रत्न को पिष्टी और भस्म दोनों ही प्रकार से औषधि के रुप में उपयोग में लाया जाता है. माणिक्य रत्न शरीर से वायु विकारों का नाश करता है. इससे रक्त में वृद्धि होती है. पेट से जुडे़ विकारों को दूर करता है. इस रत्न की भस्म के सेवन से आयु में वृद्धि होती है. माणिक्य की भस्म में वात, पित्त तथा कफ को शांत करने की शक्ति होती है. यह रत्न क्षय रोग, दर्द, उदरशूल, आंखों से संबंधित रोगों के निवारण में लाभकारी है. शरीर में होने वाली जलन को इस रत्न के उपयोग से दूर किया जाता है.

भाव प्रकाश तथा रस रत्न समुच्चय के अनुसार माणिक्य कषाय और मधुर रस प्रधान द्रव्य है. यह शीतलता प्रदान करने वाला रत्न है. नेत्रों की ज्योति को बढा़ने में मदद करता है. इस रत्न की भस्म नपुंसकता को नष्ट करती है.

मोती की भस्म | Ash of  Pearl

इस रत्न की भस्म को भी औषधि के रुप में खाया जाता है. जिन लोगों के शरीर में कैल्शियम की कमी होती है उन्हें मोती की भस्म खाने से लाभ मिलता है. मोती की भस्म ठण्डी होती है. यह आँखों के लिए गुणकारी होती है. इससे शक्ति तथा बल में वृद्धि होती है. मोती की भस्म को मुक्ता भस्म के नाम से जाना जाता है. मुक्ता भस्म से क्षय रोगों का इलाज होता है. पुराना बुखार, कृशता, खांसी तथा श्वास से जुडे़ विकारों में लाभ दिलाता है. रक्तचाप, ह्रदय रोग, जीर्णतआदि में मोती की भस्म से लाभ मिलता है.

मूँगा की भस्म | Ash of Coral

विद्वान व्यक्तियों का मानना है कि यदि मूंगे की शाखा को केवडा़ या गुलाब जल में घिसकर गर्भवती स्त्री के पेट पर लगाने से गिरता हुआ गर्भ भी रुक जाता है. इस रत्न की भस्म से कफ तथा पित्त संबंधी विकारों में राहत मिलती है. कुष्ठ रोग के लिए यह लाभाकारी है. खाँसी, बुखार तथा पांडु रोगों को ठीक करने के लिए यह एक उत्तम तथा बढ़िया औषधि है. इसके सेवन से शरीर हृष्ट-पुष्ट बनता है. मूंगे की भस्म का उपयोग पान के साथ करने से कफ तथा खांसी में लाभ मिलता है.

पन्ना की भस्म | Ash of Emrald

इस रत्न की भस्म को केवडा़ या गुलाब जल के साथ घोटकर बनाया जाता है. इसकी भस्म से रक्त से जुडी़ सभी बीमारियाँ समाप्त होती है. यह मूत्र संबंधी रोगों के लिए उपयोगी है. ह्रदय रोग में भी लाभदायक है. पन्ने की भस्म ठण्डी तथा मेदवर्धक है. इससे सेवन से व्यक्ति की भूख बढ़ती है. अम्ल तथा पित्त में आराम मिलता है. शरीर में होने वाली गर्मी से राहत मिलती है. अधिक उल्टी होने पर पन्ना की भस्म लाभकारी होती है. दमा, अजीर्ण तथा बवासीर में यह लाभकारी तथा गुणकारी होती है.

पुखराज की भस्म | Ash of Yellow Sapphire

पुखराज की भस्म को पीलिया, खाँसी, साँस से संबंधित कष्ट को दूर करने के लिए उपयोग में लाया जाता है. यह आमवात तथा बवासीर के रोगों में उपयोगी भस्म है. इसकी भस्म से कफ तथा वायु संबंधी रोग दूर होते हैं. इस रत्न की भस्म शरीर के विष तथा विषाक्त कीटाणुओं की क्रिया को नष्ट करती है. इस भस्म से मिचली में आराम मिलता है.

हीरा की भस्म | Ash of Diamond

विद्वानों का मत है कि हीरे को पीसकर नहीं खाना चाहिए. इस रत्न की भस्म को शुद्ध रुप से बनाए जाने पर ही खाना चाहिए. हीरे की भस्म से मधुमेह, रक्त की कमी, सूजन, भगन्दर, जलोदर, क्षय रोग, आदि में लाभ मिलता है. इसकी भस्म चेहरे की सुन्दरता को बढा़ने का काम करती है. रस रत्न समुच्चय के अनुसार हीरे में एक विशिष्ट गुण यह होता है कि यदि रोगी जीवन की अंतिम साँसे ले रहा है तो हीरे की केवल एक ही भस्म देने से उसमें चेतना लौट आती है.

हीरे की भस्म में वीर्य बढा़ने की शक्ति भी होती है. यह शरीर के तीनों दोषों को समाप्त करने के साथ रोगों का अंत करता है. नपुंसकता को जड़ से समाप्त करता है.

कभी यदि गलती से हीरे का कोई कण पेट में चला भी जाता है तब व्यक्ति को दूध में घी मिलाकर पिलाना चाहिए. इससे उल्टी होकर कण बाहर आ जाएगा. कण पेट में रहने से आँतों में जख्म हो सकता है. जो प्राणों के लिए भी हानिकर हो सकता है.

नीलम की भस्म | Ash of Blue Sapphire

नीलम के चूरे को केवडा़ के जल या गुलाब जल या वेद मुश्क के जल में घोटना चाहिए. जब यह बहुत ही अच्छी तरह से पावडर के समान घुट जाए तब इसे खाने के उपयोग में लाया जाता है. इस भस्म को शहद, मलाई, अदरक के रस, पान के रस आदि के साथ मिलाकर लेते हैं. यह बहुत ही भयंकर बुखार में लाभकारी होता है. मिरगी, मस्तिष्क की कमजोरी, उन्माद तथा हिचकी आदि में राहत मिलती है. इसके उपयोग से गठिया, संधिवात, उदर शूल, स्नायुविक दर्द, भ्रान्तियाँ, गुल्म, तथा बेहोशी आदि बीमारियाँ दूर होती है.

गोमेद की भस्म | Ash of Onyx Or Hessonite

इसकी भस्म बनाने से वायु शूल के कष्टों में राहत मिलती है. चर्म रोगों में लाभ मिलता है. कृमि रोगों की रोगथाम होती है. बवासीर आदि में लाभ मिलता है.

लहसुनिया की भस्म | Ash of Cat’s Eye

इसे पिष्टी के रुप में काम में लाया जाता है. इससे कफ, खाँसी, आदि रोगों में लाभ मिलता है. लहसुनिया को वैदूर्य भी कहा जाता है. यह मधुर रस प्रधान होता है. इस भस्म में शीत वीर्य गुण अधिक होता है. यह भस्म बुद्धि को तीव्र करती है. आयु बलवर्धक है. यह पित्त नाशक है. यह आँखों के रोगों को हरने वाली है. इस भस्म को विशेष रुप से पित्त से उत्पन्न रोगों को दूर करने के लिए उपयोग में लाया जाता है.

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