स्तंभेश्वर महादेव मंदिर -अनोखा मंदिर जो हो जाता है गायब !

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भारत एक प्राचीनतम सभ्यता वाला सांस्कृतिक देश हैं. यह विश्व के उन गिने-चुने देशों में से एक है जहां हर वर्ग और समुदाय के लोग शांतिपूर्वक रहते हैं. यहां की भगौलिक स्थिति, जलवायु और विविध संस्कृति को देखने के लिए ही विश्व के कोने-कोने से पर्यटक पहुंचते हैं. वैसे अपनी भारत यात्रा के दौरान पर्यटकों को जो चीज सबसे ज्यादा पसंद आती है तो वह हैं भारत की प्राचीनतम मंदिर. मंदिरों की बनावट, विशेषता, महत्व और इतिहास आदि जानने के लिए ही पर्यटक बार-बार भारत की ओर रुख करते हैं. इनमें से कई मंदिर तो ऐसे भी हैं जो कई हजारों साल पुराने हैं और जिनके बारे में जानना पर्यटकों के लिए कौतुहल का विषय है. आइए ऐसे ही मंदिरों पर प्रकाश ड़ालते हैं

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स्तंभेश्वर महादेव मंदिर (कावी, गुजरात): आप यह कल्पना नहीं कर सकते लेकिन यह बात सच है कि यह मंदिर पल भर के लिए ओझल हो जाता है और फिर थोड़ी देर बाद अपने उसी जगह वापिस भी जाता है. यह मंदिर अरब सागर के बिल्कुल सामने है और वडोदरा से 40 मील की दूरी पर है. खास बात यह है कि आप इस मंदिर की यात्रा तभी कर सकते हैं जब समुद्र में ज्वार कम हो. ज्वार के समय शिवलिंग पूरी तरह से जलमग्न हो जाता है.

शिव मंदिर (वाराणसी, उत्तर प्रदेश): आपको जानकार हैरानी होगी कि इस मंदिर का निर्माण किसी पहाड़ या समतल जगह पर नहीं किया गया है बल्कि यह मंदिर पानी पर बना है. कहने का अर्थ है कि यह शिव मंदिर आंशिक रूप से नदी के जल में डूबा हुआ है. बगल में ही सिंधिया घाट , जिसे शिन्दे घाट भी कहते हैं, इस मंदिर की शोभा बढ़ाता है. इस मंदिर में आध्यात्मिक कार्य नहीं होते और यह फिलहाल बंद है. इस मंदिर के बारे में जानने के लिए आज भी लोग जिज्ञासा रखते हैं.

मन्दिर का इतिहास

शिवशंभु के पुत्र कार्तिकेय स्वामी छह दिन की आयु में ही देवसेना के सेनापति नियुक्त कर दिए गए थे। इस समय ताड़कासुर नामक दानव ने देवसेना को आतंकित कर रखा था। देव-ऋषि-मुनि, आमजन सभी बेहद परेशान थे। कार्तिकेय स्वामी ने अपने बाहुबल से ताड़कासुर का वध कर दिया। वध के उपरांत कार्तिकेय स्वामी को ज्ञात हुआ कि ताड़कासुर भोलेनाथ का परम भक्त था।

यह जानने के बाद व्यथित कार्तिकेय स्वामी को प्रभु विष्णु ने कहा कि आप वधस्थल पर शिवालय बनवाएँ। इससे आपका मन शांत होगा। कार्तिकेय स्वामी ने ऐसा ही किया।

समस्त देवगणों ने एकत्र होकर महिसागर संगम तीर्थ पर विश्वनंदक स्तंभ की स्थापना की। पश्चिम भाग में स्थापित स्तंभ में भगवान शंकर स्वयं विराजमान हुए। तब से ही इस तीर्थ को स्तंभेश्वर कहते हैं। यहाँ पर महिसागर नदी का सागर से संगम होता है।

स्तंभेश्वर महादेव मंदिर में महाशिवरात्रि और हर अमावस्या पर मेला लगता है। प्रदोष, पूनम और ग्यारस को पूरी रात यहाँ चारों प्रहर पूजा-अर्चना होती है। दूर-दूर से श्रद्धालु दरिया द्वारा शिवशंभु के जलाभिषेक का अलौकिक दृश्य देखने यहाँ आते हैं।

लोकमान्यता के अनुसार स्तंभेश्वर महादेव मंदिर में स्वयं शिवशंभु विराजते हैं इसलिए समुद्र देवता स्वयं उनका जलाभिषेक करते हैं.

download (2)ज्वार के समय शिवलिंग पूरी तरह से जलमग्न हो जाता है और यह परंपरा सदियों से सतत चली आ रही है. यहां स्थित शिवलिंग का आकार 4 फुट ऊंचा और दो फुट के घेरे वाला है. इस प्राचीन मंदिर के पीछे अरब सागर का सुंदर नजारा नजर आता है.

पानी में डूबा हुया शिव लिंग 

download (3)यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए खासतौर से परचे बांटे जाते हैं जिसमें ज्वार-भाटा आने का समय लिखा होता है. ऐसा इसलिए किया जाता है जिससे यहां आने वाले श्रद्धालुओं को किसी भी प्रकार समस्या का सामना न करना पड़े.

मान्यता– स्कंदपुराण के अनुसार शिव के पुत्र कार्तिकेय छह दिन की आयु में ही देवसेना के सेनापति नियुक्त कर दिये गये थे. इस समय ताड़कासुर नामक दानव ने देवताओं को अत्यंत आतंकित कर रखा था. देवता, ऋषि-मुनि और आमजन सभी उसके अत्याचार से परेशान थे.

ऐसे में भगवान कार्तिकेय ने अपने बाहुबल से ताड़कासुर का वध कर दिया. उसके वध के बाद कार्तिकेय को पता चला कि ताड़कासुर भगवान शंकर का परम भक्त था. यह जानने के बाद कार्तिकेय काफी व्यथित हुए. फिर भगवान विष्णु ने कार्तिकेय से कहा कि वे वधस्थल पर शिवालय बनवाएं. इससे उनका मन शांत होगा. भगवान कार्तिकेय ने ऐसा ही किया. फिर सभी देवताओं ने मिलकर महिसागर संगम तीर्थ पर विश्वनंदक स्तंभ की स्थापना की.

श्चिम भाग में स्थापित स्तंभ में भगवान शंकर स्वयं विराजमान हुए. तब से ही इस तीर्थ को स्तंभेश्वर कहते हैं. यहां पर महिसागर नदी का सागर से संगम होता है. स्तंभेश्वर के मुख्य मंदिर के नजदीक ही भगवान शिव का एक और मंदिर तथा छोटा सा आश्रम भी है जो समुद्र तल से 500 मी. की ऊंचाई पर है.

यहां पर श्रद्धालुओं के लिए हर तरह की सुविधाएं मौजूद हैं जैसे- कमरे, छोटी सी रसोई जो साल भर पारंपरिक गुजराती भोजन मुफ्त में प्रदान करती है. इस मंदिर का वातावरण बहुत शांत और आध्यात्मिक रहता है.
अगर कोई श्रद्धालु ध्यान और योगा में दिलचस्पी रखता है तो यह बेहतर स्थल है. यहां के आश्रम में एक रात रुकने पर श्रद्धालु को रात्रि के शांत वातावरण में भगवान शिव के संपूर्ण वैभव के दर्शन मिल सकते हैं.

पर्व-त्योहार इस मंदिर में महाशिवरात्रि और हर अमावस्या पर मेला लगता है. प्रदोष पूनम और एकादशी पर यहां दिन-रात पूजा-अर्चना होती रहती है. दूर-दूर से श्रद्धालु समुद्र द्वारा भगवान शिव के जलाभिषेक का अलौकिक दृश्य देखने यहां आते हैं.

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